Monday, February 1, 2010

फर्क


चाहती हूँ हमारे बीच का प्रसंग
यूँ ही चलता रहे.....
लेकिन
सूनी रात के सन्नाटे में
अनजान राह पर
अजीब उमंग से बढ़ते हुए
क़दमों को
न चाहकर भी, करती हूँ जब
रोकने का प्रयतन
सहम जाती हूँ तब
एक चुप्पी आवाज़
मेरे भीतर से फिसलकर
पहुँच जाती हे कहीं दूर
सुन पाती हूँ
केवल प्रतिध्वनि मात्र
एहसास तब करती हूँ
कितना फर्क हे-
चलते रहने और रुक जाने में......

तुम्हारे वे अंदाज
जो मेरी समझ से बाहर हे
पहेली बन गए हे
उन्हें बूझ न पाने की लाचारी में
एहसास करती हूँ
कितना फर्क हे
समझ लेने
और ना समझ पाने में.....

जब मेरे अधरों से कहलाकर
मेरी ही बातों में मुझे उलझाकर
तुम हँस देते हो
तब एहसास करती हूँ
कितना फर्क हे
कह देने
और चुप रह जाने में.....

कभी स्मृति के दर्पण पर
झलक आता हे
किसी अनचाही याद का अक्स
और कोई बहका सा ख्याल
खींच ले जाता हे मुझे
अतीत के भँवर में
एहसास करती हूँ तब में
कितना फर्क हे
याद रखने
और भूल जाने में........

एहसासों के इस पुलिंदे को
शब्दजाल में बाँधकर
करना चाहती हूँ जब
तुम्हारे सम्मुख अभिव्यक्त
तो गुम हो जाती हे आवाज़
अन्त:करण से उभरी एक खामोश गूँज में
सोचती हूँ में तब
कितना फर्क होगा
एहसास करने
और महसूस करा पाने में........

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